कर्तव्य परायण का अर्थ कर्तव्य के प्रति आदर भाव रखना होता है


मानव जीवन कर्तव्यों का भंडार हैं उसके कर्तव्य उसकी अवस्था अनुसार छोटे और बड़े होते हैं इनको पूर्ण करने से जीवन में उल्लास ,आत्मिक शांति और यश मिलता हैं ।
देश की आजादी के आंदोलन के समय कई युवकों की अपनी भावनाएं रही होंगी उनके अपने सपने रहे होंगे किंतु उन्होंने अपनी परवाह न करते हुए हंसते-हंसते फांसी के फंदे पर झूल गए।
प्रत्येक व्यक्ति को अपने कर्तव्य के प्रति हमेशा ईमानदार रहना चाहिए समाज के सदस्य राष्ट्र का एक नागरिक होना भी मानवीय उत्तरदायित्व से लगा हुआ हैं अपनी सुविधा उसी समय तक चाहे जिससे कि दूसरों की श्रद्धा में कोई व्यवधान उत्पन्न ना हो यह हर किसी नागरिक की नैतिक जिम्मेदारी है व्यक्ति की जिम्मेदारी है अधिकारों से ज्यादा अपने कर्तव्यों को पहचाने इसीलिए यदि हम घर ,समाज राष्ट्र का विकास चाहते है तो हमे यह देखना चाहिए कि हमने किसी के लिए क्या किया है यह नही कि किसी ने हमारे लिए क्या किया है ऐसी सोच होने पर कठिनाइयां अपने आप दूर हो जाएंगे ।
यदि प्रत्येक नागरिक अपने कर्तव्य को ठीक समय पर पहचान करके उसका निर्वहन करता है तभी एक शब्द समाज का निर्माण होता है । कभी-कभी हम कर्तव्यों के मामले में भ्रम की स्थिति में हो जाते हैं । ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार महाभारत की युद्ध में अर्जुन भ्रम की स्थिति में थे जब भगवान श्री कृष्ण ने गीता का ज्ञान देकर अर्जुन की आशंकाओं को दूर किया और उन्हें सही मार्ग दिखाएं ऐसी स्थितियां सामान्य मनुष्य के जीवन में भी आना स्वभाविक है
कर्तव्य पालन ही एक ऐसी वस्तु है जिसके द्वारा हम अवर्णनीय आनंद को प्राप्त कर सकते हैं मानव मातृभूमि की रक्षा हेतु हर्षित मन से फांसी के तख्ते पर लटक जाता है उसकी अमर गाथा पुष्प पराग के समान सर्वत्र फैल जाती हैं अतः प्रत्येक मानव को कर्तव्यों का पालन अवश्य करना चाहिए । मनुष्य को अधिकार प्राप्त करने के लिए कर्तव्य का पालन करना चाहिए अधिकार खोकर बैठे रहना मनुष्य के लिए पाप है ।
“अधिकार खोकर बैठे रहना,
यह महा दुष्कर्म है
न्यायार्थ अपने बंधु को भी ,
दण्ड देना धर्म हैं ” ।

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