संवाददाता: इन्द्रजीत यादव एडवोकेट ( संपादक सर्वोच्च दर्पण न्यूज़ )

रंगों का पर्व होली भी बदलाव से अछूता नहीं है। फागुन लगते ही हंसी ठिठोली , उल्लास और अल्हड़ का माहौल अब गायब हो गया है। न तो फाग के बोल सुनाई देते और नवरंग मचाती युवाओं की टोलियां दिखती है। होली के रंग फगुआ गीत गुजिया पापड़ चिप्स बनाने के साथ सुरीले कंठ से आंगन में भगवा गाती महिलाएं जैसे नजारों को आधुनिकता ने चौपट कर दिया । प्रेम मोहब्बत तथा भाईचारे के इस पर्व पर हर गलती माफ हो जाती थी मान मनुहार जैसे छोटे-छोटे मामले कचहरी की तारीखें बनने लगे हैं
भारतीय राष्ट्रीय जन जन पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष उज्जवल प्रताप सिंह जी कहते हैं कि हमें गांव को बचाना होगा अपनी संस्कृति और परंपराओं को बचाना होगा उनका कहना है कि पहले की होली और अब में बहुत बदलाव आता जा रहा है ।
पहले हर सदस्य परिवार के बीच त्योहार मनाना पसंद करते थे।बाहर आने वाले लोग होली किस समय अपने घर जरूर आ जाते थे लोग कौशल पैदल और कच्ची सड़क से चलकर घर पहुंचते थे अब साधन होने के बावजूद आपसी मतभेद के चलते घर आने के लोग जहमत नहीं उठाते हैं । परिवेश बदला , समय बदला और होली का स्वरूप भी बदल गया है। अपनों के लिए इस त्यौहार का वह आनंद नहीं दिखता है पहले होली के लिए तैयारी 1 माह पूर्व शुरू हो जाती थी । होली के दिन मिलने का अंदाज ऐसा होता था कि जैसे सब मनमुटाव भूल विसर गए हो सबके दिल से आवभगत होते थे लेकिन समय के साथ वह प्रेम तथा होली के रंग नदारद होते जा रहे हैं। आज हमारे समाज में होली त्यौहार एकता का प्रतीक मानते हैं , बुराई पर अच्छाई की जीत को दर्शाता अब होली का त्यौहार सिमटता जा रहा है । पूर्व में जो पांच से छह दिन तक त्यौहार मनाया जाता था अब वह दो दिन मैं आकर सिमट गया है त्यौहार में भी अश्लीलता आ गई है लोग केवल इसे मांशहारी भोजन व शराब पीने का त्योहार मान बैठे है हमारे बुजुर्ग इस पर्व में एक दूसरे से मिलकर गिले-शिकवे दूर करते थे अब वह दूर की बात हो गई है सरकार भी शराब बंदी तो दूर की बात उसी बढ़ावा देती जा रही है इस दिन अपने आप में एक बुराई लिए हुए भी हैं लोक मदिरापान आदि कर आपस में ही लड़ते रहते हैं । अब सभी समाज के लोगों को जगाने का समय आ गया है हमें खुद अपनी परंपराओं को बचाने के लिए इन बुराइयों को जड़ से उखाड़ फेंकना होगा ।

आइए हम सभी लोग मिलकर प्रयास करें कि पवित्र त्यौहार होली हमारी संस्कृति से जुड़े रहें और उतना ही उत्साहवर्धक रहे जैसे पहले हुआ करते थे।

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